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Wednesday, July 8, 2020

कुछ यादें बचपन से


कुछ साल पहले की बात है

घर के बरामदे में बैठा बैठा अपने स्मार्टफोन पर गाने सुन रहा था और साथ में डेली न्यूज़ चेक कर रहा था व्हाट्सअप पर …
मैं अपने धुन में मस्त था की अनायास ही मेरी नज़र सामने वाले टीवी टावर पर चली गई | अलग ही है यह चीज़ | पचीसिओं मंजिल जितना ऊँचा , शायद उससे ज्यादा ही होगा | गगनचुम्बी शायद इसे ही कहते है | आजतक इससे ऊँचा कुछ नहीं देखा | दूर से ही दीखता है | किसी को भी बचपन में घर का पता बताना होता था तो कह देते थे की अरे वह टीवी टावर के पास है | वो देख रहे हो न , हाँ हाँ वही पर |

अलग ही सम्मोहन सी शक्ति है ..

बचपन में स्कूल भी बगल में ही था मेरा इसके | वहां से भी दीखता था | एक दो बार दूरदर्शन का प्रशारण बंद हुआ था तो हेलीकाप्टर से ठीक करने आये थे इसके माथे को | हमको हेलीकाप्टर तो दिखा नहीं था बचपन में लेकिन क्या करे अगर बोल देते की साला कहाँ है हेलीकाप्टर हमको नहीं दिख रहा तो बच्चा सब गधा गधा बोल के चिढ़ा देता पूरा स्कूल में तो मिला दिए सुर में सुर हम भी | लेकिन कुछ तो ठीक किया गया था क्यों दूरदर्शन वापस से आने लगा था और " हम लोग " , " सुरभि " , "रंगोली " , " नुक्कड़ " सब चालू हो गया था टपक से |

स्कूल कोई बड़ा था नहीं मेरा | किराये की बिल्डिंग थी और उसमें कुछ काम चलाव झोपड़ियां और उनमें ही लगती थी मेरी क्लास लेकिन दोस्तों के साथ वही क्लास आज MBA के क्लास को भी पीछे छोड़ देती है| स्कूल था तो थोड़ा छोटा लेकिन स्पोर्ट्स के फेस्टिवल जरूर करवाता था वह भी इसी टीवी टावर के कंपाउंड में | पूरा स्कूल जमा होता था | मेला लगता था और सबसे अच्छी बात की उसमें होती थी तरह तरह की रेसेस जैसे की स्पून रेस , मैथ रेस , रेमेम्बेरिंग रेस और सही से मस्ती करो तो मिलते थे तरह तरह के अवार्ड्स | मैंने भी जीते थे काफी मैथ रेस क्यूंकि दौड़ने में भले नहीं अच्छा था लेकिन मैथ के प्रॉब्लम बनाने में टकाटक

 लेकिन इन सब से अच्छी बात होती थी टिफ़िन की | टीवी टावर के पीछे एक नहर होती थी ( थी क्या आज भी है ) जो मेरे घर तक जाती थी | माँ भले कभी आये न आये लेकिन स्पोर्ट्स डे के दिन जरूर आती थी हमारा गेम देखने और हम तैयार रहते थे माँ के हाथ का हलवा खाने को | भाड़ में गया स्पोर्ट्स टोस्पोर्ट्स , हलवा याद रहता था हरसमय | जैसे ही मम्मी आती दिखती थी , हम लोग दूर से हिरन के छोटे छोटे बच्चों की तरह कुलांचे भरने लगते थे उसी टीवी टावर के मैदानों में और लिपट जाते थे मम्मी से बोलते हुए की हलवा खिलाओ
आज न तो वो मैदान बचा है और न ही मेरा स्कूल बचा है

लेकिन वह टीवी टावर आज भी है | आज भी है याद दिलाता हुआ उसी हलवे की महक याद दिला कर .. आज भी खुश हो जाता हूँ की कुछ तो है इन कंक्रीट के जंगलों में जो आज भी मेरे बचपन की याद को ज़िंदा रखा हुआ है

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